मंदिर की पवित्रता और पर्यावरण: हम सबकी ज़िम्मेदारी

मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं; पीढ़ियों के प्रणाम से बनी एक जीवंत विरासत है। उसकी पवित्रता की रक्षा केवल पुरोहित या समिति का काम नहीं—हर भक्त का दायित्व है।

भक्तों से विनम्र अनुरोध

  • प्लास्टिक नहीं—फूल और बेलपत्र कागज़ या पत्तों के दोने में लाएँ।
  • प्रसाद, अगरबत्ती और फूल निर्धारित स्थान पर ही रखें।
  • जूते तय जगह पर उतारें और कतार में धैर्य रखें।
  • गर्भगृह की तस्वीर से पहले पुरोहित की अनुमति लें; मोबाइल साइलेंट रखें।
  • धीरे बोलें, बच्चों के साथ रहें और बुज़ुर्गों को पहले रास्ता दें।
  • दिघी (तालाब) या प्रांगण के जल में कुछ न फेंकें।

प्रांगण की देखभाल

राजबाड़ी प्रांगण के पुराने मंदिर, दालान और पेड़ हमारे इतिहास के साक्षी हैं। दीवारों पर लिखना, टेराकोटा या नक्काशी को छूना-खरोंचना, डालियाँ तोड़ना—छोटी गलतियाँ भी स्थायी नुकसान करती हैं। विरासत एक बार नष्ट हो जाए तो लौटती नहीं।

प्रबंधन में शिष्टता

मंदिर की सेवा करने वालों—पुरोहित, सेवायत, स्वयंसेवक—की शिष्टता और पारदर्शिता ही भक्तों के विश्वास का आधार है। दक्षिणा का साफ़ हिसाब, सबके साथ समान व्यवहार और उत्सवों की भीड़ के लिए योजना—यही आधुनिक मंदिर-सेवा का सार है।

उत्सव के दिनों में

काली पूजा और बड़ी तिथियों पर भीड़ बढ़ती है। स्वयंसेवकों के निर्देश मानें और कचरा स्वयं डिब्बे में डालें। प्रांगण को जैसा पाया था, उससे थोड़ा अधिक साफ़ छोड़कर जाएँ—यही हमारी प्रणामी हो।

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